वो
जब तकरीर करता है कोई अवतार लगता है
मगर
झूठा मुझे उसका यही किरदार लगता है
दिखाई
जो नहीं देता हक़ीकत में कहीं यारों
नुमाइश
में उसीके आजकल अखबार लगता है
गरजते तो दिखाई दे रहे बादल यहाँ कितने
बरसने का नहीं उनका मगर आसार लगता है
बड़ी सहमी हुई सी आजकल है आबरू अपनी
उसे ही लूटने को हर कोई तैयार लगता है
जो बनता है बिगड़ता है नफ़ा नुकसान के दमपर
उसे रिश्ता कोई कहले मगर व्यापार लगता है
अदालत
की नजर में शख्स वो मुज़़रिम तो है लेकिन
सियासत
में वही सबका अभी सरदार लगता है
जो करता है वतन के ख्वाब से खिलवाड़ यूँ हरदिन
दिमागी तौर पर वह आदमी बीमार लगता है
अब इतना बोलबाला है फ़रेबी का यहाँ लोगो
कि
जो ईमानवाला है वही ग़द्दार लगता है
कभी
वह भूलकर अब चाँद को मामा नहीं कहता
हमारे
दौर का बच्चा बड़ा हुश्यार लगता है
शंभु शरण मंडल
प्रकाशित हिन्दी मासिक हंस मई 2019
